(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.72. अध्यायः 072
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
व्यासेन युधिष्ठिरंप्रति पृथिवीसंचाराय मेध्याश्वोत्सर्जनचोदना॥ 1 ॥ तथाऽश्वरक्षणेऽर्जुनस्य नियोजनम्॥ 2 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः।
व्यासमामन्त्र्य् मेधावी ततो वाचनमब्रवीत्॥ 14-72-1(94472)
यदा कालं भवान्वेत्ति हयमेधस्य तत्त्वतः।
दीक्षयस्व तदा मां त्वं त्वय्यायत्तो हि मे क्रुतुः॥ 14-72-2(94473)
व्यास उवाच। 14-72-3x(7918)
अयं पैलोथ कौन्तेय याज्ञवल्क्यस्तथैव च।
विधानं यद्यथा कालं तत्कर्तारौ न संशयः॥ 14-72-3(94474)
चैत्र्यां हि पौर्णमास्यां तु तव दीक्षा भविष्यति।
सम्भाराः सम्भ्रियन्तां च यज्ञार्थं पुरुषर्षभ॥ 14-72-4(94475)
अश्वविद्याविदश्चैव सूता विप्राश्च तद्विदः।
मेध्यमश्वं परीक्षन्तां तव यज्ञार्थसिद्धये॥ 14-72-5(94476)
तमुत्सृज यथाशास्त्रं पृथिवीं सागराम्बराम्।
सपर्येतु यशो नाम्ना तव पार्थिव वर्धयन्॥ 14-72-6(94477)
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पाण्डवः पृथिवीपतिः।
चकार सर्वं राजेन्द्र यथोक्तं ब्रह्मवादिना॥ 14-72-7(94478)
सम्भारश्चैव राजेन्द्र सर्वे सङ्कल्पितास्तता॥ 14-72-8(94479)
स सम्भारान्समाहृत्य नृपो धर्मसुतस्तदा।
न्यवेदयदमेयात्मा कृष्णद्वैपायनाय वै॥ 14-72-9(94480)
ततोऽब्रवीन्महातेजा व्यासो धर्मात्मजं नृपम्।
यथाकालं यथायोगं सज्जाः स्म तव दीक्षणे॥ 14-72-10(94481)
स्फ्यश्च कूर्चश्च सौवर्णो यच्चान्यदपि कौरव।
यत्तु योग्यं भवेत्किञ्चिद्रौक्मं तत्क्रियतामिति॥ 14-72-11(94482)
अश्वश्चोत्सृज्यतामद्य पृथ्व्यामथ यथाक्रमम्।
सुगुप्तं चरतां चापि यथाशास्त्रं यथाविधि॥ 14-72-12(94483)
युधिष्ठिर उवाच। 14-72-13x(7919)
अयमश्वो यता ब्रह्मन्नुत्सृष्टः पृथिवीमिमाम्।
चरिष्यति यथाकामं तत्र वै संविदीयताम्॥ 14-72-13(94484)
पृथिवीं पर्यटन्तं हि तुरगं कामचारिणम्।
कः पालयेदिति मुने तद्भवान्वक्तुमर्हति॥ 14-72-14(94485)
इत्युक्तः स तु राजेन्द्र कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत्।
भीमसेनादवरजः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्।
जिष्णुः सहिष्णुर्धृष्णुस्च स एनं पालयिष्यति॥ 14-72-15(94486)
शक्तः स हि महीं जेतुं निवातकवचान्तकः।
तस्मिन्ह्यस्त्राणि दिव्यानि दिव्यं संहननं तथा।
दिव्यं धनश्चेषुधी च स एनमनुयास्यति॥ 14-72-16(94487)
स हि धर्मार्थकुशलः सर्वविद्याविशारदः।
यथाशास्त्रं नृपश्रेष्ठ चारयिष्यति ते हयम्॥ 14-72-17(94488)
राजपुत्रो महाबाहुः श्यामो राजीवलोचनः।
अभिमन्योः पिता वीरः स एनमनुयास्यति॥ 14-72-18(94489)
भीमसेनोपि तेजस्वी कौन्तेयोऽमितविक्रमः।
समर्थो रक्षितुं राष्ट्रं नकुलश्च विशाम्पते॥ 14-72-19(94490)
सहदेवस्तु कौरव्य समायास्यति बुद्धिमान्।
कुटुम्बतन्त्रं विधिवत्सर्वमेव महायशाः॥ 14-72-20(94491)
स तु सर्वं यथान्यायमुक्त कुरुकुलोद्वहः।
चकार फल्गुनं चापि संदिदेश हयं प्रति॥ 14-72-21(94492)
युधिष्ठिर उवाच। 14-72-22x(7920)
एह्यर्जुन त्वया वीर हयोऽयं परिपाल्यताम्।
त्वमर्हो रक्षितुं ह्येनं नान्यः कश्चन मानवः॥ 14-72-22(94493)
ये चापि त्वां महाबाहो प्रत्युद्यान्ति नराधिपाः।
तैर्विग्रहो यथा न स्यात्तथा कार्यं त्वयाऽनघ॥ 14-72-23(94494)
आख्यातव्यश्च भता यज्ञोऽयं मम सर्वशः।
पार्थिवेभ्यो महाबाहो समये गम्यतामिति ॥ 14-72-24(94495)
वैशम्पायन उवाच। 14-72-25x(7921)
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा भ्रातरं सव्यसाचिनम्।
भीमं च नकुलं चैव पुरगुप्तौ समादधत्॥ 14-72-25(94496)
कुटुम्बतन्त्रे च तदा सहदेवं युधांपतिम्।
अनुमान्य महीपालं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः॥ ॥ 14-72-26(94497)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि द्विसप्ततितमोऽध्यायः॥ 72 ॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-72-11 स्फ्यः काष्ठखङ्गः स चात्र सौवर्णः। कूर्च आसनार्थं कुशमुष्टिः सोऽप्यत्र सौवर्णः॥ 7-72-12 सुगुप्तं सुरक्षितं यथा स्यात्तथा॥


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